- ‘पहलगाम में 26 बेटियों-बहनों का सिंदूर उजाड़ने वालों को माफ कर दिया?’
बेबाक/संजीव मिश्र
पहलगांव में हमारी बेटियों और बहनों का सुहाग उजाड़ने के आरोपित पाकिस्तान के साथ खेल के मैदान में हाथ मिलाने के फैसले ने दुनिया भर के करोड़ों भारतीय खेल प्रेमियों का दिल दु:खाया है। एशिया कप में भारतीय टीम भले ही पाकिस्तान के साथ खेलने जा रही हो लेकिन इस फैसले के विरोध की जैसी हवा चल रही है उसको देखते हुए तो यही कहा जा सकता है कि इस मैच के टेलीकास्ट से ब्राडकास्टर को फायदा नहीं होने जा रहा, क्योंकि बड़ी संख्या में भारतीय दर्शक इस मैच को नहीं देखेंगे।
आपकी Sportsleak.inने जब कुछ राहगीरों से इस मैच को लेकर बात की तो उन्होंने पहले सवाल भरी नजरों से देखा और फिर अपनी दिल की बात कह दी। आयूष ने गुस्से में कहा कि हम पहलगाम के कातिलों के साथ होने वाले इस मुकाबले को नहीं देखेंगे। एक अन्य क्रिकेट प्रेमी राकेश नारंग ने कहा कि इसका मतलब तो यह निकलता है कि पहलगाम में 26 बेटियों-बहनों का सिंदूर उजाड़ने वालों को आपने माफ कर दिया। टीवी और सोशल मीडिया में इस फैसले को लेकर डिबेट्स चल रही हैं। यकीनन देश और दुनिया में रह रहे बड़ी संख्या में भारतीय इस मैच की लाइव कवरेज और हाईलाइट्स न देखकर ब्राडकास्टर और बीसीसीआई को बता देंगे कि वे इस फैसले से नाराज हैं।
पहलगाम हमला 22 अप्रैल 2025 को हुआ था और उसके सिर्फ 145 दिन बाद भारतीय टीम एशिया कप में पाकिस्तान के साथ क्रिकेट खेलती दिखेगी। सुप्रीम कोर्ट से हरी झंडी मिलने के बाद ही यह तय हो गया था कि इस मुकाबले को रुकवाने का आखिरी प्रयास भी विफल हो चुका है। सवाल उठ रहे हैं कि दुनिया के सबसे अमीर और ताकतवर क्रिकेट बोर्ड को आखिर क्यों पाकिस्तान के साथ मल्टीनेशनल टूर्नामेंट में खेलने को मजबूर होना पड़ा। आइये बताते हैं कि पाकिस्तान से एशिया कप क्रिकेट में खेलने की हमें क्या मजबूरियां गिनाई जा सकती हैं।
दरअसल एशिया कप में पाकिस्तान से खेलने की कोई सीधी “मजबूरी” नहीं है, लेकिन कुछ वास्तविक कारण और कथित मजबूरियां हैं जो भारत और बाकी एशियाई देशों को टूर्नामेंट में साथ खेलने को मजबूर करती हैं। ये मजबूरियां राजनीतिक, खेल संगठनात्मक नियम और राजस्व से जुड़ी होती हैं। एशिया कप को Asian Cricket Council (ACC) आयोजित करता है, जिसमें भारत, पाकिस्तान, श्रीलंका, बांग्लादेश, अफगानिस्तान आदि देश सदस्य हैं। ACC के तहत आयोजित टूर्नामेंट में सभी सदस्य देशों को हिस्सा लेना होता है। कोई देश अगर किसी एक सदस्य (जैसे पाकिस्तान) के साथ नहीं खेलता, तो यह संगठन के नियमों का उल्लंघन हो सकता है। यही वजह है कि भारत पर भी यह दबाव रहता है कि वो टूर्नामेंट में हिस्सा ले और सभी टीमों से खेले। लेकिन यहां भारत आतंकवाद को मुद्दा बनाकर पाकिस्तान के साथ खेलने से इंकार कर सकता था।
ICC (International Cricket Council) और ACC में नियम है कि क्रिकेट को राजनीति से अलग रखा जाए। अगर भारत पाकिस्तान से खेलने से मना करता है, तो उसे टूर्नामेंट से बाहर भी किया जा सकता है या उस पर जुर्माना लग सकता है। यहां राष्ट्र को सर्वोपरि रख हम यह सजा स्वीकार कर पहलगाम के शहीद परिवारों के साथ खड़े हो सकते थे पर ऐसा नहीं किया गया। असल बात तो यह है कि सारा मामला ही कमाई से जुड़ा है।
भारत और पाकिस्तान के बीच मैच से भारी दर्शक संख्या और विज्ञापन मिलते हैं। भारत-पाक मैच दुनिया में सबसे ज्यादा देखे जाने वाले खेल आयोजनों में से एक है और ACC और आयोजक देश इन मैचों से भारी पैसा कमाते हैं, इसलिए पाकिस्तान को बाहर करने का कोई वित्तीय फायदा नहीं है। असली खेल तो कमाई को लेकर ही है ना?
कहा जा रहा है कि राजनीतिक प्रतिबंध केवल द्विपक्षीय संबंधों पर लागू होते हैं। भारत और पाकिस्तान के बीच द्विपक्षीय सीरीज (bilateral series) बंद हैं, लेकिन मल्टीनेशनल टूर्नामेंट जैसे एशिया कप या वर्ल्ड कप में दोनों देश साथ में हिस्सा ले सकते हैं। यह तो वही बात हुई कि गुड़ खा सकते हैं पर गुलगुले से परहेज़ करते हैं। भारत सरकार ने पाकिस्तान के साथ द्विपक्षीय क्रिकेट पर प्रतिबंध लगाया है, लेकिन ICC या ACC टूर्नामेंटों में खेलने पर नहीं। ऐसा क्यों भाई? क्या इन टूर्नामेंट में पाकिस्तान की बजाय ICC या ACC अपनी न्यूट्रल टीम उतारता है? जब आप बाहर उसके साथ खेल सकते हैं तो अपने या उसके देश में खेलने से क्या बनता बिगड़ता है?
यह भी कहा जा रहा है कि अगर भारत हर बार पाकिस्तान के साथ खेलने से मना कर देगा तो इससे कूटनीतिक दबाव बन सकता है और भारत पर “राजनीतिक कारणों से खेल से दूरी” बनाने का आरोप भी लग सकता है। लेकिन सवाल उठता है कि जब हम पहलगाम हमले के जवाब में पाकिस्तान को उसके घर के अंदर घुस कर मार सकते हैं तो ऐसे आरोपों की परवाह क्यों करते हैं? पाकिस्तान आतंकवादी घटनाओं को अंजाम देकर भी न सिर्फ इंटरनेशनल क्रिकेट खेलता रहता है बल्कि आतंकवाद से पीड़ित देश को नियमों से बांध कर अपने साथ खेलने को मजबूर कर लेता है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या नश्लभेद करने पर दक्षिण अफ्रीका को लम्बे समय तक अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से बहिष्कृत रखने का निर्णय गलत था?
दरअसल यह भारत की मजबूरी नहीं बल्कि रणनीतिक और संगठनात्मक विवशता है कि वो पाकिस्तान से एशिया कप जैसे टूर्नामेंट में खेलने को तैयार हो जाता है, क्योंकि यह एक नियंत्रित भागीदारी है, जो खेल के वैश्विक नियमों, राजस्व और कूटनीति को संतुलित करती है। लेकिन यहां भी राष्ट्र को सर्वोपरि रख हम आतंकवादी गतिविधियों को पोसने वाले इस देश से खेलने से इंकार कर सकते थे जो कि नहीं किया गया।
कुछ भी हो लेकिन भारत के प्रधानमंत्री और रक्षामंत्री जब यह ऐलान कर चुके हैं कि ऑपरेशन सिंदूर अभी खत्म नहीं हुआ है तो फिर पाकिस्तान के साथ खेलने का औचित्य क्या है? क्या हम पाकिस्तान के साथ खेलने से इंकार करके किसी भी कीमत को चुकाने की घोषणा नहीं कर सकते? सोचिए, बिना भारत के आईसीसी कितने महीने इंटरनेशनल क्रिकेट करवा पाएगा और कितना आर्थिक नुकसान उठा पाएगा?
आसिफ रिजवी भी इस फैसले के खिलाफ हैं। उनका कहना है कि क्या आपकी संवेदनाएं बिल्कुल मर चुकी हैं? क्या 145 दिन पहले धर्म पूछ कर मारे गए पर्यटकों की बेवाओं का दर्द भी भारत-पाकिस्तान मैच से होने वाली मोटी कमाई की खातिर आप भूल जाएंगे? आप भले ही भूल जाएं लेकिन देश की जनता नहीं भूलने वाली। जिस राजस्व के लालच में सैलानियों के कातिल पाकिस्तान के साथ खेलने का फैसला किया गया है, उस मैच को देश की अधिकांश जनता ठुकरा चुकी है। और हां आपकी Sportsleak.in भी इस मैच की कवरेज नहीं करेगी।










