गजब हाल है! 91 साल के रणजी इतिहास में सिर्फ एक ट्रॉफी और तीन फाइनल

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-यूपी होम विकेट पर नागालैंड के खिलाफ इस सीजन जीत के सबसे आसान मौके को भुनाने उतरेगी 

कानपुर। 91 साल के रणजी ट्रॉफी इतिहास में सिर्फ एक ट्रॉफी और 3 फाइनल! हैं ना हैरान करने वाले आंकड़े? लेकिन ये आंकड़े सही हैं। उत्तर प्रदेश टीम की स्थिति कभी बहुत अच्छी नहीं रही। 1934 में यूनाइटेड प्रावियांस के नाम से रणजी खेलना शुरू करने वाली यूपी टीम ने एकमात्र ट्रॉफी 2005-06 के फाइनल में बंगाल को हराकर जीती थी। इस मैच में कप्तान मोहम्मद कैफ ने 92 व 109, जबकि सुरेश रैना ने 90 व 52 रनों की पारियां खेली थीं। यह ट्रॉफी भी न आई होती यदि अतिरिक्त खिलाड़ी के रूप में अली हामिद जैदी ने महत्वपूर्ण मौके पर लक्ष्मी रतन शुक्ला का कैच न पकड़ लिया होता। इस फाइनल का फैसला पहली पारी की लीड पर हुआ था। लक्ष्मी रतन शुक्ला जब अंतिम विकेट के रूप में आउट हुए तब बंगाल पहली पारी की लीड से सिर्फ 15 रन दूर था।

चलिए अब ग्रीनपार्क चलते हैं, जहां नागालैंड से शुरू होने जा रहे मुकाबले के लिए नेट्स पर खिलाड़ियों की ताकत देख ली गई है और अब अगले चार दिन उनकी आजमाइश 22 गज पर होने जा रही है। यूपी टीम के लिए यह मैच काफी अहम है। वह रणजी ट्रॉफी एलीट ग्रुप ए के मुकाबले में होम विकेट पर इस सीजन जीत के सबसे आसान मौके को भुनाने उतरेगी। नागालैंड अंक तालिका में बॉटम में पड़ी है जबकि यूपी की स्थिति भी कोई बहुत बेहतर नहीं है। उसके तीन मैचों से 7 अंक ही हैं और वह पांचवें पायदान पर है। यूपी यहां सीधी जीत से पूरे अंक लेकर आगे के कठिन मुकाबलों में ऊंचे मनोबल के साथ उतरना चाहेगी। दूसरी ओर नागालैंड भी प्वाइंट टेबल में अपने लिए सम्मान जनक स्थिति बनाने का प्रयास करेगी।

होम विकेट पर इस सीजन यूपी का यह तीसरा मुकाबला है। आन्ध्र प्रदेश और उड़ीसा के खिलाफ उसे 3-3 अंक ही मिल सके थे, जबकि बड़ौदा में बारिश के बाद कोटांबी स्टेडियम में खराब आउटफील्ड और लापरवाह मैनेजमेंट की वजह से दोनों टीमों को मैदान में उतरने का मौका ही नहीं मिल सका, लिहाजा एक-एक अंक बांट दिया गया।

यूपी का पिछला सीजन भी खराब ही गया था और उसे एक जीत हासिल हुई थी। परिणाम स्वरूप यूपीसीए ने हेड कोच सुनील जोशी के कान्ट्रैक्ट को आगे नहीं बढ़ाया और अरविंद कपूर को नया कोच बना दिया। हेड कोच की दौड़ में यूं तो ज्ञानेन्द्र पाण्डेय आगे चल रहे थे लेकिन मैनेजमेंट से तालमेल रखने में माहिर अरविंद कपूर को वरीयता मिली।

हालांकि अनुभव के मामले में ज्ञानेन्द्र पाण्डेय और अरविंद कपूर में काफी अंतर है। लेकिन फिलहाल हेड कोच अरविंद ही हैं। वैसे भी कप्तान-कोच चाहे कोई भी हो यूपी टीम के प्रदर्शन पर कोई फर्क नहीं पड़ता। हां कोच राजिंदर सिंह हंस और कप्तान मोहम्मद कैफ की जोड़ी ने 20 साल पहले जो किया वह जरूर याद किया जाता है। इस एकमात्र ट्रॉफी को छोड़ दें तो देश की कुल आबादी की 16.5 फीसदी जनसंख्या वाले इस राज्य की रणजी ट्रॉफी में बेहद दयनीय स्थिति है। तसल्ली के लिए 1997-98, 2007-08 और 2008-09 भी यूपी टीम केअच्छे सीजन कह सकते हैं, जब टीम फाइनल तक पहुंची। ऐसा भी नहीं कि यहां से बड़े खिलाड़ी न निकले हों। लेकिन जब टीम की सफलता की बात आती है तब गिनाने के लिए कुल जमा एक ट्रॉफी और तीन फाइनल ही निकलते हैं।

 

 

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