बेबाक/संजीव मिश्र
यूपी ने अंतिम बार 2005-06 यानि 25 साल पहले रणजी ट्रॉफी जीती थी। इतने सालों में एक बच्चा पैदा होने के बाद सारी स्कूलिंग, जॉब और शादी करके अपना बच्चा भी दुनिया में ले आता है। लेकिन यूपी क्रिकेट की बदनसीबी देखिए कि इन ढाई दशकों में उसकी टीम दूसरी रणजी ट्रॉफी नहीं ला पाती। अब तक दोबारा वैसी टीम नहीं खड़ी की जा सकी जो वो सुनहरा पल ला सके। ऐसा तब है जब उस फाइनल जीतने वाली टीम के बाद से अब तक यूपी के 70 खिलाड़ी रणजी डेब्यू कर चुके हैं। टीम खड़ी भी हो तो कैसे जब रणजी टीम के साथ ‘म्यूजिकल चेयर गेम’ खेला जा रहा हो। पहले रणजी टीम में बमुश्किल एक दो चेंज ही होते थे, क्योंकि इतना टैलेंट था कि बदलाव की गुंजाइश ही नहीं होती थी। लेकिन आज के दौर में कब किस खिलाड़ी की इन्ट्री हो और कब किसकी जगह चली जाए, पता ही नहीं चलता।
ट्रॉफी जीतने के बाद खेले इन खिलाड़ियों में से कितनों की याद है
इन 70 खिलाड़ियों में कुछ को छोड़ दें तो आपको कितने खिलाड़ियों के नाम याद होंगे। फाइनल जीतने के बाद अगले सत्र से अब तक डेब्यू करने वाले तन्मय श्रीवास्तव, ताहिर अब्बास, अली मुर्तजा, आबिद खान, सुदीप त्यागी, भुवनेश्वर कुमार, प्रशांत गुप्ता, मोहम्मद इम्तियाज, दिग्विजय सिंह रावत, एकलव्य सिंह, आशीष यादव, रोहित चौधरी, मोहम्मद जाहिद अली, मुकुल डागर, अंकित सिंह राजपूत, उमंग शर्मा, अक्शदीप नाथ, अमित मिश्रा, आकाश वर्मा, हिमांशु असनौड़ा, शिवम चौधरी, मोहम्मद सैफ, कुलदीप यादव, अलमास शौकत, सरफराज खान, इसरार ए. खान, ध्रुव प्रताप सिंह, सौरभ कुमार, समर्थ सिंह, रिंकू सिंह, उपेंद्र यादव, अभिषेक गोस्वामी, विनीत पंवार, कार्तिक त्यागी, जीशान अंसारी, प्रियम गर्ग, शिवम मावी, माधव कौशिक, यश दयाल, राहुल सिंह रावत, आर्यन जुयाल, मोहित जांगड़ा, शुभम मावी, आकिब खान, वाजिद अली, समीर रिज़वी, मोहसिन खान, करन शर्मा, ध्रुव जुरेल, शिवम शर्मा, जसमेर धनकर, प्रिंस यादव, आराध्य यादव, अजांक्य सूर्यवंशी, कार्तिकेय जयसवाल, समीर चौधरी, शिवा सिंह, अटल बिहारी राय, कुनाल यादव, नितीश राणा, स्वास्तिक चिकारा, सिद्धार्थ यादव, विप्रज निगम, विजय कुमार, रितुराज शर्मा, आदित्य शर्मा, कृतज्ञ कुमार सिंह, वैभव चौधरी, प्रशांत वीर और कार्तिक यादव यूपी के लिए खेल चुके हैं। इनमें कितनों ने याद रखने लायक प्रदर्शन किया सबके सामने है।
कुछ लोगों ने यूपी क्रिकेट को प्रयोगशाला बना डाला
यह दुर्गति यूं ही नहीं हुई इसके लिए वो व्यवस्था दोषी है, जिसने कथित तौर पर अनैतिक लाभ के लिए यूपी क्रिकेट को प्रयोगशाला बना डाला है। यही वजह है कि रणजी में उसे झारखंड जैसी टीम के खिलाफ अपनी दूसरी सबसे खराब हार से रूबरू होना पड़ा। अब इस प्रयोगशाला के वैज्ञानिक कौन-कौन हैं यह किसी से छिपा भी नहीं है, भले ही वे पर्दे के पीछे से सारा खेल रच रहे हों। इनके खास ही विभिन्न एज ग्रुप व रणजी टीम के कोच और मैनेजर बनते हैं। इतना ही नहीं सलेक्शन कमेटी में कौन-कौन रहेगा यह भी वे ही तय करते हैं। कहने का मतलब है कि पूरे स्टेट के क्रिकेट पर इनका मकड़जाल है। यूपीसीए के एक पदाधिकारी ने नाम न खोलने की शर्त पर कहा कि आप तो जानते ही हैं कि कहां से आदेश आता है और कैसे सलेक्टर्स की बनाई टीम अचानक बदल जाती है। उस शक्ति के आगे हम सब खुद को असहाय महसूस करते हैं।
यूपी क्रिकेट के अब वो दिन नहीं रहे
लखनऊ के केडी सिंह बाबू स्टेडियम में 2005-06 में खेला गया वो फाइनल आज भी याद है जिसमें बंगाल ने यूपी के बल्लेबाजों को आउट करने के लिए अपने आठ गेंदबाजों का इस्तेमाल किया था। अब झारखंड जैसी टीम के आक्रमण के सामने यूपी की बल्लेबाजी 28 ओवरों के अंदर ही घुटने टेक देती है और वो भी होम विकेट पर! सोचिए, 25 सालों में किसी राज्य के क्रिकेट का इतना पतन कैसे हो सकता है। यह देखकर तो लगता है कि पिछले दिनों सलेक्शन के लिए खिलाड़ियों से पैसे के लेन-देन के जो ऑडियो वायरल हुए अब उनकी फिर से गहराई से जांच होनी चाहिए।
खुदा मेहरबान तो ….
आखिर क्यों एक औसत से भी निचले स्तर के रहे पूर्व खिलाड़ी को कई सालों से सलेक्शन या टीम से जुड़ी अहम् जिम्मेदारियां सौंपी जा रही हैं? आखिर क्यों तीन रणजी मैच खेला यह व्यक्ति सौ से ज्यादा रणजी मैच खेले एक पूर्व अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ी से बड़ी टीम का चीफ कोच बना दिया जाता है, यहां तक कि उसका डिप्टी कोच भी उससे कहीं ज्यादा रणजी मैच खेल चुका है? कौन सा टैलेंट उसे व्यवस्था का चहेता बनाए रखता है? यह तो वही कहावत हुई ना कि खुदा मेहरबान तो ….
सही मायने में कौन चला रहा है यूपी क्रिकेट
यूपी में क्रिकेट नेपथ्य से आखिर चला कौन लोग रहे हैं? क्योंकि जो लोग पद लिए बैठे हैं वे सिर्फ ऊपर से बनकर आई टीमों पर चिड़िया बैठाने (हस्ताक्षर करने) भर की भूमिका में हैं। टीम खराब खेलती है तो आलोचना झेलने के लिए उनके चेहरे सामने रहते हैं लेकिन जवाबदेही किसी की नहीं होती। कभी अपने बल्लेबाजों को दोषी ठहरा दिया जाता है तो कभी प्रमुख खिलाड़ियों के न होने को खराब प्रदर्शन की वजह बता दिया जाता है। कथित रूप से यूपीसीए में कई लोग सलेक्शन कमेटी के कार्य में दखलंदाजी करते हैं। शहर की एक असरदार शख्सियत की गली के कुछ लोगों का यूपी क्रिकेट पर कब्जा सा हो चुका है। परिवारवाद से यूपी क्रिकेट में ईमानदारी से काम करने वाले लोग कराह रहे हैं। दरअसल परिवारवाद पनपने के पीछे भी एक वजह है, एक योजना है, जिसे फिर कभी बताएंगे।










