संजीव मिश्र/स्पोर्ट्सलीक
कोई भी खेल जब वजूद में आता है तो उसके कई गुमनाम हीरो होते हैं। एकदम किसी सफल फिल्म के उन कैमरामैनों की तरह जिनकी फिल्म की कामयाबी में बहुत बड़ी भूमिका होती है लेकिन कोई उनका जिक्र नहीं करता, न तो डायरेक्टर और न ही नायक। वर्ल्ड कप ट्रॉफी की चमक में महिला क्रिकेट का एक ऐसा ही शिल्पी गुम हो गया, जिसे याद रखना शायद बेहद जरूरी था।
जीवन भर तक महिला क्रिकेट के हित की सोचते रहे
आज का नेशनल मीडिया मंदिरा बेदी, अमोल मजूमदार और हरमनप्रीत कौर की टीम की कवरेज में ऐसा डूबा कि उसे न तो भारत में महिला क्रिकेट के जन्मदाता महेन्द्र कुमार शर्मा की याद आई और न ही जेब से पैसा खर्च कर यूपी में महिला क्रिकेट को खड़ा करने वाले एक ऐसे हीरो की जो जीवन के अंत तक महिला क्रिकेट के लिए ही सोचता रहा और जब तक शरीर में ताकत रही उसके लिए भाग दौड़ करता रहा। यह शख्स था लखनऊ का मोहम्मद नवाब।

तब लड़कियों को मैदान तक लाने के लिए पापड़ बेलने पड़ते थे
मोहम्मद नवाब महिला क्रिकेट को बड़े कैनवास पर लाने के लिए चली शुरुआती एक बैटन रिले की तरह महेन्द्र कुमार शर्मा से बैटन लेकर शिद्दत से दौड़े। उन्होंने महिला क्रिकेट को उस गाढ़े समय में तराशा जब हम मन से यह स्वीकार नहीं कर पाते थे कि लड़कियां भी क्रिकेट खेल सकती हैं।
यूपी में महिला क्रिकेट के सबसे पुराने माली को किसी ने भी याद नहीं रखा
माता-पिता अपनी लड़कियों को इसलिए नहीं भेजते थे कि धूप में चेहरा सांवला हो गया तो उनकी शादी नहीं होगी, इसके अलावा समाज का ताना-बाना भी कुछ ऐसा था जिसमें लोअर टीशर्ट में लड़कियों के घर से निकलते ही तमाम निगाहें उनको जज करने लगती थीं।
नवाब मियां और पं. दिनेश मिश्रा को कैसे भूल सकता है महिला क्रिकेट
इन बाधाओं के बावजूद मोहम्मद नवाब लड़कियों को किसी तरह घरों से निकाल मैदान तक लेकर आते थे। इसी तरह कानपुर में पं. दिनेश मिश्रा भी महिला क्रिकेट को पुरुषों के क्रिकेट जैसा मुकाम दिलाने के लिए कानपुर के ब्रजेन्द्र स्वरूप पार्क में सुबह से पसीना बहाया करते थे।

लखनऊ में नवाब महिला क्रिकेट का एडमिस्ट्रेटिव भाग संभालते तो कानपुर में पंडित जी कोचिंग। दोनों ने ही देश को कई बड़ी खिलाड़ी भी दीं। लेकिन अफसोस! महिला क्रिकेट ने जब आसमान छुआ तो उस ऊंचाई से किसी को भी न तो नवाब मियां दिखाई दिए और न किसी ने मैदान पर अपना खून जलाने वाले पं. दिनेश मिश्रा को याद किया।
खबर लगवाने के लिए झगड़ पड़ते थे नवाब
महिला क्रिकेट के लिए पूरी तरह समर्पित रहे नवाब उस दौर में टीम को खड़ा कर रहे थे, जब न तो सोशल मीडिया का युग था और न ही प्रिंट व कम लोकप्रिय इलेक्ट्रॉनिक मीडिया महिला क्रिकेट को गंभीरता से लेता था। नवाब अखबारों के दफ्तरों में जाते और लड़कियों की परफॉर्मेंस के लिए थोड़ी सी जगह देने को गिड़गिड़ाने की स्थिति में गुजारिश करते।
यदि गल्ती से भी कभी कह दिया कि आज विज्ञापन ज्यादा रहेगा इसलिए सिर्फ महत्वपूर्ण खबरें ही जाएंगी तो हत्थे से उखड़ जाते। दफ्तर में ही चिल्ला पड़ते ‘क्या हमारी लड़कियों की खबर आपको महत्वपूर्ण नहीं लगती, वे यूं ही धूप में पसीना बहाती हैं। बड़े चले हैं अखबार निकालने।’ और पैर पटकते हुए लौट जाते।

अगले दिन जब उनको अपनी खबर ठीक से लगी मिलती तो गिल-गिल कंपट हो दौड़े चले आते शुक्रिया अदा करने। कहते आपके खबर लगा देने से लड़कियों का भला हो जाएगा
और अगली चैम्पियनशिप के लिए फंड की व्यवस्था हो जाएगी। कुछ ऐसे ही नरम-गरम स्वभाव के थे नवाब मियां। लखनऊ का सारा प्रिंट मीडिया उनके इस मिजाज को अच्छी तरह समझता था और उनको सम्मान देता था।
70 के दशक से माली बनकर महिला क्रिकेट को बड़ा किया
महिला टीम के वर्ल्ड कप चैम्पियन बनने पर खूब लिखा जा रहा है। बेटियों के इस कारनामे को सलाम बनता भी है। वह क्या ही खूबसूरत और दिल को छू लेने वाला नजारा था,
जब हरमनप्रीत कौर और उनकी टीम ने ग्राउंड पर मौजूद झूलन गोस्वामी व मिथाली राज के हाथों में ट्रॉफी सौंप महिला क्रिकेट को इस बुलंदी तक पहुंचाने में उनके योगदान को दुनिया के सामने सम्मान दिया था। झूलन तो रो ही पड़ी थीं।
बनता है, बिल्कुल बनता है हर उस सीढ़ी को चूमना जिन पर एक-एक पायदान चढ़कर 52 साल की कड़ी मेहनत के बाद चमचमाती ट्रॉफी हमारी बेटियों के हाथ में आ सकी हो।
ये तो वो सुनहरा वर्तमान था जो आज की पीढ़ी को देखने को मिला लेकिन उनको भी हमें नहीं भूलना चाहिए, जिन्होंने माली बनकर क्रिकेट को 70 के दशक से सींचा और उसे पोसकर आज कद्दावर बनाया। अब मोहम्मद नवाब इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनके सींचे पौधे वृक्ष बनकर पूरे देश और भारतीय महिला क्रिकेट को गर्व की अनुभूति करवा रहे हैं।
नवाब मियां को अभिभावकों की भी करनी पड़ती थी मान मनौव्वल
यूपी महिला क्रिकेट के पूर्व सचिव मोहम्मद नवाब वुमेन्स क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ इंडिया के संयुक्त सचिव भी रहे। लेकिन उनके कार्यकाल तक न संघ के पास पैसा होता था और न ही कोई लड़कियों के क्रिकेट को सीरियस लेता था।
फिर भी नवाब मियां फंडिंग के लिए नौकरशाही और प्राइवेट कंपनियों से गिड़गिड़ाते रहते थे। यह वो ही समय था जब नवाब को घर-घर जाकर लड़कियों को मैदान तक लाने के लिए उनके अभिभावकों की मान मनौव्वल भी करनी पड़ती थी।
जब नवाब मियां ने प्रायोजक के धोखा देने पर अपनी बकरियां बेच दीं
महिला क्रिकेट का कोई रहनुमा नहीं था, इसलिए टूर्नामेंट खेलने के लिए जब टीम बाहर जाती तो नवाब साहब के सामने सबसे बड़ी समस्या टीम की किट, टिकट और रास्ते के भोजन की होती। उनमें क्रिकेट को फलक पर देखने का जुनून था इसलिए खेल को जारी रखने के लिए जो भी रास्ता होता अपनाते।
जब फंड की व्यवस्था नहीं हो पाती तो लड़कियों से टिकट के लिए 50-50 रुपए या जिसकी जैसी हैसियत होती चंदा लिया जाता। नवाब मियां खुद भी जेब खाली कर देते।
कई बार तो ऐसा भी हुआ जब लड़कियों को टूर्नामेंट के लिए डबल जर्नी सिंगल फेयर से भी काम चलाना पड़ता। इसमें एक तरफ के टिकट का नवाब साहब इंतजाम करते और एक तरफ का टिकट खुद खिलाड़ियों को खरीदना पड़ता।
1986 में डिस्ट्रिक्ट टूर्नामेंट करा रहे थे, इनका आठ टीम का प्लान था, लेकिन टीम 12 हो गई। नवाब साहब ने प्रायोजक को भी बता दिया था। टूर्नामेंट समाप्त होने के बाद प्रायोजक गायब हो गया यानी पैसा नहीं दिया तो नवाब साहब ने अपनी पांच बकरियों को 800 में बेचा और सबका उधार चुकाया।
टूर्नामेंट खेलो चाहे कोच के दरवाजे और टॉयलेट के पास बैठकर जाना पड़े
कभी-कभी ऐसा भी होता जब रिजर्वेशन न मिलने पर नवाब हताश निराश से में खिलाड़ियों के सामने मुंह लटकाकर खड़े हो जाते। ऐसे में लड़कियां स्थितियां संभालतीं और कहतीं कोई बात नहीं सर हम किसी तरह जर्नी मैनेज कर लेंगे। वे कहते कैसे भी जाओ लेकिन टूर्नामेंट खेलना है।
पूरी टीम स्लीपर कोच के दरवाजे और टॉयलेट के पास बैठ सफर करके टूर्नामेंट खेलने पहुंचतीं। रास्ते में स्टेशन पर मिलने वाली पूड़ी और टमाटर-आलू की सदाबहार रसेदार सब्जी इनकी भूख शांत करती। लेकिन यह कष्ट वे तब भूल जातीं जब मैच के लिए मैदान पर उतरतीं।
‘सफर नहीं हमें तो टूर्नामेंट में जीत हासिल करने की टेंशन रहती थी’
उस दौर की एक खिलाड़ी ने कहा ‘सफर तो चंद घंटों का होता था, हमें सफर तो बस टूर्नामेट में जीत हासिल करने की टेंशन हुआ करती थी।’
टूर्नामेंट में मिली एक जीत भी मोहम्मद नवाब को ऊर्जा से भर देती और वे फिर तरोताजा होकर फंड के लिए इधर-उधर भागदौड़ शुरू कर देते। नवाब मियां का गर्मियों में होने वाला ऑल इंडिया मीना कुमारी टूर्नामेंट शायद ही उस दौर की कोई खिलाड़ी भूली होगी। इस टूर्नामेंट का देश भर की महिला खिलाड़ियों को इंतजार रहता था।
कैम्प में मिलती रोटी और न्यूट्रीनेगेट की सब्जी
केडी सिंह बाबू स्टेडियम में इसके लिए कई दिन कैम्प चलते। फंड का जुगाड़ हो नहीं पाता था। पूरी टीम को खाना खिलाना होता। ऐसे में खिलाड़ियों के लिए स्टेडियम गेट के पास में ही मिलने वाली रोटी और न्यूट्रीनेगेट की सब्जी ही प्रोटीन और एनर्जी देने का काम करती।
आज की खिलाड़ियों को बीसीसीआई पुरुष टीम जितनी मैच फीस और टीए/डीए देती है और राज्यों में भी महिला टीम के लिए सारी थ्री और फाइव स्टार सुविधाएं होती हैं, जबकि उस दौर में गरीब घरों से आने वाली खिलाड़ियों को दो समय का पेट भर भोजन तक नहीं मिल पाता था। पहले की खिलाड़ियों ने कितने अभावों में अपने खेल को जारी रखा।
पिता की तरह डांटते और हारने पर लड़कियों को प्यार से समझाते भी
मोहम्मद नवाब को इस दौरान खूब आलोचनाओं और आरोपों का भी सामना करना पड़ा लेकिन वे अपनी धुन में महिला क्रिकेट के लिए पूरी शिद्दत से लगे रहे।
न जाने क्यों मध्य प्रदेश की टीम के खिलाफ नवाब मियां को टीम का हारना पसंद नहीं था। जब भी एमपी से मैच होता वे खुद पहुंच जाते और एक-एक गेंद पर उनकी प्रतिक्रिया चेहरे के हाव-भाव बदलते रहते। कोई खिलाड़ी कैच छोड़ देती तो बाहर से ही चिल्लाते ‘छोड़ दिया, आसमान में तारे तोड़ने जा रही थी क्या।’
लड़कियां मैच हारतीं तो पिता की तरह डांटते और हताश होतीं तो उन्हें बैठाकर प्यार से समझाते भी, अपनी जेब से खर्च कर चाय-समौसा मंगवाते और खिलाते (तब यही बहुत होता था)। यह मेहनत जाया नहीं गई। रीता डे, अर्चना मिश्रा, नीतू डेविड, हेमलता काला, वर्षा रैफल व कुछ अन्य खिलाड़ियों ने सिर गर्व से ऊंचा भी किया।
बुजुर्ग आंखों में महिला क्रिकेट को आसमान पर देखने के पलते थे सपने
नवाब मियां जब मैदान से दूर हुए तब भी उनकी चश्मे से झांकतीं बुजुर्ग आंखों में महिला क्रिकेट को आसमान पर देखने के सपने पलते थे। 13 जुलाई 2018 को इसी चाह के साथ वे दुनिया से रुखसत हो गए।
लेकिन परवान चढ़ चुके महिला क्रिकेट का अंत तक हाल लेते रहे। लेकिन आज जब इस गुमनाम हीरो के योगदान को बिसरा दिया गया तो सोचा बता दिया जाए कि महिला क्रिकेट को शैशव काल में पालने वाले एक हमारे नवाब मियां भी थे।










