हेड कोच और चीफ सलेक्टर इंडियन क्रिकेट को ग्रेग चैपल दौर जैसी आग में झुलसा रहे

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बेबाक/संजीव मिश्र

बात जरा लंबी हो गई है लेकिन मजबूरी है। एक विदेशी कोच भारतीय टीम को घुटनों पर लाने की बात करता है। दूसरे टेस्ट में उसी की सरजमीं पर सबसे बड़ी शिकस्त देकर कमजोर भी साबित कर देता है। टीम इंडिया में चयन और प्लेइंग इलेवन चुनने में इन दिनों जो मनमानी चल रही है क्रिकेट खेलने वाले सभी देश उससे वाकिफ हैं। पिछले डेढ़ दशकों की बात करें तो टीम इंडिया का इतना बुरा हाल कभी नहीं देखा। मौजूदा प्रदर्शन तो उस दौर को दोहराता नजर आ रहा है, जब हमने क्रिकेट खेलना शुरू ही किया था।

घर में बार-बार मेहमानों के हाथों क्लीन स्वीप

चीफ सलेक्टर अजित अगरकर और मुख्य कोच गौतम गंभीर की जुगलबंदी में टीम इंडिया सिर्फ बांग्लादेश और वेस्टइंडीज जैसी टीमों से ही अपने घर में सीरीज जीत पा रही है। न्यूजीलैंड के खिलाफ घर में क्लीन स्वीप, आस्ट्रेलिया से उसकी जमीन पर 1-3, इंग्लैंड से उसकी जमीन पर 2-2 और अब घरेलू विकेट पर दक्षिण अफ्रीका के हाथों एक बार फिर क्लीन स्वीप! अखिर यह हो क्या रहा है? माफ कीजिएगा, जब-जब टीम जीतती है तब-तब तारीफ भी आप दोनों की ही होती है तो जब-जब हारेगी तब-तब आलोचनाएं भी आपको ही झेलनी पड़ेंगी। शुरू में ऐसा लगा कि नये कोच गौतम गंभीर टीम को समझने और उससे तालमेल बैठाने में समय ले रहे हैं। लेकिन अब जब उनका ट्रांजेक्शन पीरियड खत्म हो गया तो खिलाड़ियों के ट्रांजेक्शन पीरियड को खराब प्रदर्शन की वजह बताने लगे। लेकिन ऐसा है नहीं, दरअसल क्रिकेट जानने वाले यह बखूबी देख पा रहे हैं कि पिछले कुछ समय से हो क्या रहा है। मुख्य कोच गौतम गंभीर के कार्यकाल में अब तक टीम इंडिया ने कुल 19 टेस्ट खेले हैं, जिसमें उन्हें 10 में हार का सामना करना पड़ा है, तो वहीं सिर्फ 5 में जीत हासिल हुई है, जबकि तीन मैच ड्रॉ पर खत्म हुए।

टीम मैनेजमेंट में कुछ लोग अपना-अपना एजेंडा चला रहे

क्रिकेट विशेषज्ञों और पूर्व दिग्गजों को साफ नजर आ रहा है कि टीम मैनेजमेंट में कुछ लोग अपना-अपना एजेंडा चला रहे हैं। एक की गलती को दूसरा ओढ़ रहा है। अब देखिए कैसे पहले टेस्ट की हार के बाद गौतम गंभीर की पैरवी पर बैटिंग कोच चुने गए सितांशु कोटक हेड कोच का बचाव करने खड़े हो जाते हैं। वे बोले थे कि गौतम गंभीर के खिलाफ जो आलोचना हो रही हैं, उसमें कुछ लोगों का अपना एजेंडा है। उन्होंने भी हार का ठीकरा भारतीय बल्लेबाजों पर फोड़ दिया था और कहा था कि टीम की बल्लेबाजी खराब रही, न कि कोच की लीडरशिप में कोई कमी है। यानि आप टीम नहीं अपनी और अपने सहयोगियों की नौकरी बचाने पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं, जबकि जिन बल्लेबाजों को आप हार का मुजरिम बता रहे हैं उनमें ज्यादातर आपकी पसंद के ही हैं।

कोटक अपने कोच को बचाने के लिए कुछ भी बोलते हैं

सितांशु कोटक ने यह भी कहा कि कोलकाता की पिच खराब थी और गंभीर ने क्यूरेटर को बचाने के लिए पिच की जिम्मेदारी खुद पर ले ली। कहा कि गंभीर ने पिच को लेकर कोई बहाना नहीं बनाया, बल्कि टीम के खिलाड़ियों के प्रदर्शन को कमजोर बताया। कोटक ने यह भी कहा कि टीम के अंदर एक ‘पीआर वॉर’ की स्थिति बन गई है, जिसमें गंभीर को निशाना बनाया जा रहा है जबकि असली मुद्दा खिलाड़ियों का प्रदर्शन है। कोटक ने खिलाड़ियों की कमियों को हार की मुख्य वजह बताया था।

..तब कोटक की उपयोगिता ही कहां बचती

अब जरा गौर कीजिए सितांशु कोटक कहते हैं कि कोलकाता की पिच खराब थी लेकिन कोच ने क्यूरेटर की गलती ओढ़ ली, हेड कोच और फिर बैटिंग कोच ने भी बल्लेबाजों को ही खराब प्रदर्शन का दोषी ठहराया। अब कोई कोटक से पूछे कि जब बल्लेबाजों की ही गलती थी तो फिर टीम इंडिया में बैटिंग कोच क्या कर रहे थे? और क्या इन दो टेस्ट मैचों में प्रदर्शनों के बाद भी उनकी कोई उपयोगिता रह जाती है? उनकी बातों से तो यह भी लग रहा है कि कोच और खिलाड़ियों में संवादहीनता है और खिलाड़ी अपने कोच के साथ सहज नहीं हैं।

सीनियर्स से छुटकारे की जल्दी में टेस्ट टीम खराब कर बैठे

अब लौटते हैं गंभीर के कार्यकाल के बाद शुरू हुई उठा पटक पर। टीम मैनेजमेंट को किन्हीं कारणों से रविचन्द्रन अश्विन, विराट कोहली, रोहित शर्मा, चेतेश्वर पुजारा, आंजिक्य रहाणे जैसे टेस्ट के स्थापित बल्लेबाजों से छुटकारा पाने की तो जल्दी थी लेकिन उसके पास इनकी खाली जगह भरने के लिए कोई प्लानिंग नहीं थी। इसी इसी सीरीज की बात करें तो आप दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ पहले टेस्ट में साईं सुदर्शन के प्लेइंग इलेवन में होते हुए वाशिंगटन सुंदर को तीसरे नंबर पर उतार देते हैं और फिर गुवाहाटी टेस्ट में उसे आठवें नम्बर पर ढकेल देते हैं। यह दर्शाता है कि सबसे महत्वपूर्ण तीसरे नम्बर के लिए आपका दृष्टिकोण ही स्पष्ट नहीं है।

भारतीय क्रिकेट को अपनी बपौती न समझें

टेस्ट में नीतीश कुमार रेड्डी और व्हाइट बॉल की बात करें तो हर्षित राणा, प्रसिद्ध कृष्णा जैसे खिलाड़ी बिना परफॉर्म या एक परफार्मेंस पर कई-कई मैच खेल जाते हैं। शुभमन गिल टेस्ट और वन डे के कप्तान हैं और टी-20 के भी दावेदार हैं, इसलिए वे चल पाएं या न चल पाएं लेकिन जिस क्रम में चाहेंगे खेलेंगे, फिर चाहे यशस्वी जयसवाल जैसा बल्लेबाज बाहर बैठ इंतजार करते अपना कॅरिअर ही क्यों न गंवा बैठे। सरफराज खान सेंचुरी जड़ने के बाद भी टीम में नहीं रह पाते और घर पर ढेरों रन बनाने वाले अभिमन्यु ईश्वरन को आप सिर्फ टूरिस्ट बनाए रखने के बाद बिना मौका दिए हटा देते हैं। मोहम्मद शमी घरेलू क्रिकेट में विकेट चटका रहे हैं लेकिन चीफ सलेक्टर उनकी फिटनेस को लेकर अपडेट मांग रहे हैं। आलोचक सवाल उठा रहे हैं कि इन दोनों ने क्या भारतीय क्रिकेट को अपनी बपौती समझ रखा है? चीफ सलेक्टर के मन में क्या चलता है, किसी के लिए भी अंदाजा लगाना मुश्किल है।

गंभीर-अगरकर की जोड़ी ने टेस्ट क्रिकेट को प्रयोगशाला बना डाला

टेस्ट क्रिकेट की टीम के साथ छेड़छाड़ बहुत सोच समझकर नफा नुकसान का आंकलन कर की जाती है, क्योंकि यही वास्तविक क्रिकेट है और इसमें ऐसे विशेषज्ञों की जरूरत होती है जो 5 दिन विभिन्न परिस्थितियों के मुताबिक खेल सकने की क्षमता रखते हों। लेकिन गंभीर और अगरकर की जोड़ी ने टेस्ट क्रिकेट को प्रयोगशाला बना डाला है। यह सारी गतिविधियां ग्रेग चैपल के दौर की याद दिलाती हैं। चलिए जरा उन दो सालों की भी याद कर लेते हैं, जब भारतीय क्रिकेट ऐसा लग रहा था कि किसी तूफान से गुजर रहा हो, कुछ वैसे ही हालात आज भी हैं। सीनियर्स पर शिकंजा कसने के गुरु ग्रेग के कार्यकाल की तरह ही इस बार भी यह दांव उलटा पड़ गया है।

गुरु ग्रेग के कार्यकाल में भी खूब हलचल मची थी

जब ग्रेग चैपल को हेड कोच की जिम्मेदारी सौंपी गई थी तब भी टीम इंडिया में मौजूदा गंभीर कार्यकाल की तरह हलचल मच गई थी। सौरभ गांगुली और वीरेंद्र सहवाग जैसे अनुभवी खिलाड़ी अपने सम्मान की रक्षा के लिए जूझ रहे थे। वो तो गनीमत रही कि सचिन तेंदुलकर पर उनका प्रभाव नहीं चला। बेहतरीन ऑलराउंडर इरफान पठान का कॅरिअर छोटा होने की वजह भी चैपल ही थे। युवराज सिंह और सुरेश रैना जैसे कुछ ही खिलाड़ी उनके प्रिय व नजदीक रहे।

सौरभ गांगुली और वीरेन्द्र सहवाग संग विवाद चर्चा में थे

ग्रेग चैपल जब भारतीय टीम के कोच थे (2005-2007), उस समय उनके कई सीनियर खिलाड़ियों के साथ संबंध विवादों में रहे। खासकर सौरभ गांगुली और वीरेन्द्र सहवाग जैसे खिलाड़ी हमेशा उनके निशाने पर रहते थे। ग्रेग चैपल और गांगुली का टकराव दुनिया ने देखा था, जबकि गांगुली की ही पैरवी पर चैपल को कोच बनाया गया था। चैपल ने गांगुली को टीम से बाहर करने की पैरवी की और उन पर टीम का माहौल खराब करने का आरोप लगाया, जिससे गांगुली का कॅरिअर प्रभावित हुआ। तब लगता था कि जैसे चैपल ने भारतीय क्रिकेट को बर्बाद करने की सुपारी ले रखी हो।

कई सीनियर्स का टीम में स्थान सुरक्षित नहीं रहा था

वीरेंद्र सहवाग, हरभजन सिंह और जहीर खान जैसे सीनियर खिलाड़ियों भी अक्सर टीम में लगातार अंदर-बाहर होते रहे। दरअसल चैपेल यह संदेश देना चाहते थे कि टीम में किसी का स्थान सिर्फ इसलिए सुरक्षित नहीं है कि वो काफी सीनियर है और उसके रिकॉर्ड अन्य पर भारी हैं। लेकिन इससे असुरक्षा और भ्रम की स्थिति बनी। यहां तक कि बाद में सचिन तेंदुलकर ने तक चैपल को बेहद ‘अहंकारी’ कोच बताया और कहा कि उनके व्यवहार ने टीम की स्थिरता और आत्मविश्वास को नुकसान पहुंचाया। जब गंभीर कोच बने तो उन्होंने भी खिलाड़ियों में सुपर स्टार कल्चर को खत्म करने का बीड़ा उठा लिया

गंभीर ने संकेत दिए थे “पर्सनल रिकॉर्ड” या “स्टार कल्चर” नहीं चलेगा

गौतम गंभीर ने भी कोच बनते ही साफ संकेत दे दिया था कि टीम में किसी भी खिलाड़ी के लिए “पर्सनल रिकॉर्ड” या “स्टार कल्चर” नहीं चलेगा, हर किसी को टीम के प्लान और 2027 वर्ल्ड कप की रोडमैप के हिसाब से ही खेलना होगा। मतलब यह चेतावनी खास तौर पर सीनियर खिलाड़ियों के लिए थी कि अगर वे टीम की जरूरतों और नए एग्रेसिव स्टाइल के मुताबिक फिट नहीं बैठे तो केवल नाम या पुराने रेकॉर्ड के दम पर जगह सुरक्षित नहीं रहेगी। उस समय यह ठीक भी लगा था, क्योंकि विराट कोहली और रोहित शर्मा जैसे सीनियर खिलाड़ी जब मर्जी होती भारतीय टीम के लिए उपलब्ध होते और जब मन करता अपनी निजी समस्याएं बता छुट्टी ले लेते थे।

सीनियर्स समझ गए थे उनका कार्यकाल पूरा हो गया

गंभीर की विराट कोहली से उनकी पुरानी अदावत किसी से छिपी नहीं है। दिग्गज ऑफ स्पिनर रविचन्द्रन अश्विन ने जब देखा कि उन पर लगातार वाशिंगटन सुंदर को तरजीह मिल रही है तो वे बीच आस्ट्रेलिया दौरे से अपना संन्यास घोषित कर भारत लौट आए। उनके इस फरमान से विराट और रोहित शर्मा जैसे सीनियर्स को भी समझ में आ गया था कि टेस्ट क्रिकेट में उनका समय अब पूरा हो चुका है। लेकिन गंभीर से एक बड़ी गलती यह हो गई कि वे इनका बैकअप ढूंढे बगैर अश्विन, विराट, रोहित और चेतेश्वर पुजारा जैसे दिग्गजों को विदा कर बैठे, जबकि आंजिक्य रहाणे और मोहम्मद शमी भी उसी राह के मुसाफिर नजर आ रहे हैं। यदि इंग्लैंड में रवीन्द्र जडेजा न चमके होते तो आज उनके नाम पर पर भी पूर्व टेस्ट खिलाड़ी लग गया होता।

बीसीसीआई भी टीम इंडिया के गिरते प्रदर्शन के लिए कम दोषी नहीं

प्लेइंग इलेवन में शुभमन गिल और केएल राहुल के अलावा मिडिल ऑर्डर में कोई ऐसा बल्लेबाज नहीं है जो टेस्ट क्रिकेट में जरूरी धैर्य और आत्मविश्वास का से गेंदबाजों का सामना कर सके। कहने को रिषभ पंत, ध्रुव जुरेल, रवीन्द्र जडेजा और वाशिंगटन सुंदर के नाम गिनाए जा सकते हैं लेकिन दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ 0-2 की हार इनके सिंगल परफॉर्मेंस को खारिज करती है। घर में आए दिन टेस्ट क्रिकेट में हमारी हार भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड को भी मुजरिम बॉक्स में खड़ा करती है।

बल्लेबाज स्पिनरों को खेलना कैसे भूल गए

आपके बल्लेबाज आज अपने ही ट्रैकों पर स्पिन खेलना कैसे भूल गए। क्यों नहीं स्पोर्टिंग और तेज विकेट तैयार हो पा रहे हैं और क्यों नहीं नियम बना पाए कि प्लेइंग इलेवन में वे ही खिलाड़ी चुने जाएंगे जो रणजी ट्रॉफी में परफॉर्म करके आएंगे? सुनील गावस्कर जैसे महान बल्लेबाज ने भी अपने दौर में रणजी ट्रॉफी क्रिकेट भी खूब खेला था। आज उनसे बड़ा खिलाड़ी कौन है मौजूदा टीम में जिसे घरेलू क्रिकेट खेलने में दिक्कत है।

न्यूजीलैंड और दक्षिण अफ्रीका के बल्लेबाज व स्पिनर्स हमसे बेहतर खेले

पहले न्यूजीलैंड के बल्लेबाजों और स्पिनरों ने दिखाया कि वे भारतीय विकेटों पर भी अब मेजबान टीम से बेहतर हैं और अब दक्षिण अफ्रीका के बल्लेबाजों ने हमारे विकेट पर आसानी से रन बनाकर और उनके सीमर्स व स्पिनर्स ने हमारी टीम को कभी 189, तो कभी 93, या 201 और या फिर 140 रन पर समेट अपनी श्रेष्ठता साबित की। यही वजह है कि मेहमान टीम के कोच के मुंह से टीम इंडिया को घुटने पर लाने जैसे बोल निकल रहे हैं।

क्या यह हार बीसीसीआई को जगा पाएगी

जरा सोचिए, हम ही अपने विकेट पर 408 रनों से हार जाते हैं। इस सीरीज के बाद गौतम गंभीर और चीफ कोच अजित अगरकर की मनमानी पर बीसीसीआई का दखल जरूरी हो जाता है। हम विश्व टेस्ट चैम्पियनशिप की दौड़ में रहेंगे या बाहर हो जाएंगे यह अलग मुद्दा हो सकता है लेकिन भारतीय क्रिकेट की इस दुर्गति के पीछे एक कोच की जिद और चीफ सलेक्टर की मनमानी खत्म होनी ही चाहिए। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या बीसीसीआई को यह हार जगा पाएगी। टीम इंडिया के खिलाड़ियों का वास्तव में यदि अपने कोच के साथ सामंजस्य नहीं बन पा रहा है तो क्या आगे भी समस्या नहीं खड़ी होगी?

कहां गए कोच के वे उसूल और वे निष्पक्ष नीतियां

कोच बनाए जाने के बाद गौतम गंभीर ने बड़ी-बड़ी और क्रिकेट हित में ऐसे-ऐसी बातें कहीं कि हर किसी को लगा कि अब भारत को अच्छा कोच मिल गया है जो निष्पक्षता के साथ टीम को शिखर पर लेकर जाएगा। गंभीर ने तब कहा था कि टीम का संयोजन पूरी तरह पारदर्शी होगा और चयन में ईमानदारी व संवाद प्राथमिकता होगी। जो कि अब कहीं देखने को नहीं मिल रहा। उन्होंने कहा कि खिलाड़ियों को बाहर रखना कोच के लिए कठिन होता है, लेकिन टीम की जरूरतों के आधार पर ही चयन होगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। आर. अश्विन, विराट कोहली और रोहित शर्मा दबाव में टेस्ट क्रिकेट छोड़ने को बाध्य हुए।

वर्कलोड मैनेजमेंट का नियम भी टूट गया

इसके साथ ही गंभीर ने वर्कलोड मैनेजमेंट पर कड़ा रुख अपनाया, उनके अनुसार अगर कोई खिलाड़ी आराम चाहता है तो उसे आईपीएल छोड़ देना चाहिए, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय मैचों में खेलने से इंकार नहीं किया जाएगा। उन्होंने कहा कि कप्तान और खिलाड़ियों को सभी अंतरराष्ट्रीय मुकाबले खेलने होंगे और आराम के लिए केवल आईपीएल से ब्रेक लेने का विकल्प है। बात बिल्कुल ठीक थी लेकिन यहां उन्होंने जसप्रीत बुमराह को लेकर अपना यह नियम खुद तोड़ दिया। बुमराह आईपीएल में तो खेलते रहे लेकिन जब भारत को उनकी जरूरत पड़ती तो वे साफ कह देते कि पूरी सीरीज नहीं खेल पाऊंगा या कि बस इस-इस टेस्ट में ही खेलूंगा।

अब क्या कहेंगे कोच, टीम हित जरूरी है या आप?

कभी बल्लेबाज का प्रदर्शन खराब था और कभी सीरीज का शैड्यूल ही खराब था। यानि आप सभी, आपके निर्णय सही और चीफ कोच का टीम सलेक्शन भी सही! हेड कोच अपने उस बयान का संज्ञान क्यों नहीं लेते, जब उन्होंने दो दिग्गजों (विराट कोहली और रोहित शर्मा) की ओर इशारा करते हुए कहा था कि कोई खिलाड़ी देश या भारतीय क्रिकेट से बड़ा नहीं हो सकता। बिल्कुल सही कहा था लेकिन अब अपने बारे में भी भी यही बात लागू क्यों नहीं करते। आपका ईगो या आप भारतीय क्रिकेट से बड़े नहीं हैं तो इंतजार किस बात का। टीम इंडिया लगातार बार-बार खराब प्रदर्शन कर रही है और आप अपने ही बारे में फैसला नहीं ले पा रहे।

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