यूपी क्रिकेट में सुलग रहा आक्रोश रूपी ‘बम’, क्या हिलेगा राजा का सिंहासन?

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बेबाक/संजीव मिश्र

 

तेज सुगबुगाहट है कि यूपी क्रिकेट में बदलाव का करंट दौड़ रहा है और संघ के भीतर व बाहर आक्रोश रूपी एक ‘बम’ सुलग रहा है जो कभी भी फट सकता है। खबर है कि क्रिकेट के इस संग्राम में यूपी के एक कद्दावर भाजपा नेता भी इंट्री की तैयारी में हैं। बड़े व्यावसायिक घराने के खास लोगों और यूपीसीए के कुछ रुष्ट पदाधिकारियों के साथ लखनऊ में बैठकें चल रही हैं। इन बैठकों में आगे की रणनीति तैयार की जा रही है। पिछले हिसाब-किताब की फाइलें खुल रही हैं। उधर हर दांव पेंच में निपुण यूपीसीए का मौजूदा तंत्र इन गतिविधियों से अनभिज्ञ नहीं है। बॉस ने भी अपने मुखबिर छोड़ रखे हैं जो हर ब्रेकिंग बॉस तक पहुंचा रहे हैं। मसलन कौन कहां किससे मिलने जा रहा है, कौन किस बड़े नेता के घर गया और वहां से कितनी देर में निकला वगैराह -वगैराह।

सूत्रों से खबर है कि यूपी की प्रतिभाओं संग हो रहे अन्याय और कुछ पदाधिकारियों की मनमानी ने ही नेताजी का ध्यान यूपी क्रिकेट की ओर खींचा है। यूपीसीए की मुखालफत करने वाले भाजपा के पूर्व मंत्री मोहसिन रजा के भी इन बड़े नेताजी के सम्पर्क में होने के चर्चे हैं। लम्बे अर्से से यूपी में हर आयु वर्ग ट्रॉफी के लिए कम से कम 3 से 4 टीमों की मांग की जा रही है। मुख्यमंत्री स्वयं एक क्रिकेट समारोह के दौरान यूपी के खिलाड़ियों के हित में बीसीसीआई के कार्यवाहक अध्यक्ष के सामने सार्वजनिक मंच पर यह इच्छा प्रकट कर चुके हैं। लेकिन यूपीसीए की ओर से अब तक इस मुद्दे पर कोई गंभीरता नहीं दिखाई गई। यूपी में अभी भी एक ही टीम है और उसमें भी प्रदेश के बाहर के खिलाड़ियों को प्रमुखता देकर राज्य के टैलेंट को इग्नोर किया जा रहा है।

टैलेंट की अनदेखी ने कई खिलाड़ियों को यूपी छोड़ने पर मजबूर कर दिया है। यही नहीं, यूपीसीए पर जनता के पैसे की बर्बादी और संघ में भाई-भतीजावाद फैलाने के आरोप भी लग रहे हैं। टीमों के सलेक्शन के दौरान संघ में बैठे रिश्तेदारों के दखल को दबी जुबान में सलेक्शन कमेटियां भी स्वीकार रही हैं। खिलाड़ियों की किट से लेकर ट्रैवल और होटल में टीम के स्टे तक में इन रिश्तेदारों का सीधा दखल बताया जाता है।

यूपीसीए के एक पीड़ित पदाधिकारी ने नाम न खोलने की शर्त पर बताया कि अब पानी सिर के ऊपर से बह रहा है, क्योंकि संघ में बैठे बॉस के कुछ खास लोग जिस भी तिल से तेल निकाला जा सकता है निकाल रहे हैं। कुछ रिश्तेदारों के पैरों में तो अचानक 35 हजार के कीमती जूते आ गए हैं। यही वजहें हैं कि कुछ लोग लामबंद होकर इस बार राज्य सरकार के एक बड़े नेता के पास जुट रहे हैं। खास बात यह है कि इस लड़ाई में कानपुर का एक बड़ा उद्योग घराना भी यूपीसीए में सुधार के लिए कवायद कर रहा है।

दूसरी ओर मौजूदा पदाधिकारियों को पूरा भरोसा है कि उनके बॉस इस बार भी सब संभाल लेंगे। संघ के एक पदाधिकारी ने ऑफ द रिकॉर्ड कहा कि हम दो दशक से ऐसे ही संघ नहीं चला रहे हैं। आप भी जानते हैं कि किसी बड़ी संस्था को चलाने पर आरोप लगते ही रहते हैं। हो सकता है कि कुछ कमियां हों। लेकिन हम भरोसा दिलाते हैं कि उन्हें जल्दी ही सुधार लेंगे। यह भी खम ठोंका कि हमारे विरोधी न तो पहले कुछ बिगाड़ पाए थे और न ही अब कुछ उखाड़ पाएंगे।

यूपीसीए में सुधार का एक ऐसे पदाधिकारी की ओर से यह भरोसा दिया जा रहा है जिसे अपना नाम खुलने तक से डर लग रहा है और ऑफ द रिकॉर्ड बोलता है। बता दें कि इन्होंने पूर्व सचिव ज्योति बाजपेई से तब सत्ता ली थी, जब यूपी को देश के क्रिकेट का पावर हाउस कहा जाता था। कार्यकाल संभाले 21 साल हो गए लेकिन इस दौरान एक बार भी ऐसी टीम चुन के नहीं दे सके जो रणजी ट्रॉफी जीत कर ला पाती। मजाक यह कि वे अब भी सुधार का ही भरोसा दे रहे हैं। यह तो वही बात हुई कि ‘मच्छरों’ से ही मलेरिया का इलाज करवाया जाए।

 

 

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