गजब है! यूपीसीए ने सपोर्टिंग स्टाफ पर ही साढ़े पांच करोड़ फूंक दिए

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-उपाध्यक्ष राकेश मिश्रा का ज़मीर जागा तो उठा दिए सवाल, पूछा कौन कर रहा है जम्बो स्टाफ की नियुक्ति? किसको कितना भुगतान करना है यह कौन तय करता है?

लखनऊ। संजीव मिश्र

क्या आपको पता है कि कानपुर के ग्रीनपार्क स्टेडियम पर बकाया 9-10 करोड़ की राशि को कम करवाने के लिए राज्य सरकार की नाक में दम कर देने वाला यूपीसीए हर सीजन टीमों के सपोर्टिंग स्टाफ पर पानी की तरह पैसा बहाता है। गुजरे सीजन में ही लगभग साढ़े पांच करोड़ रुपए विभिन्न एज ग्रुप की पुरुष और महिला टीमों के सपोर्टिंग स्टाफ पर लुटा दिए गए। इसके एवज में यूपीसीए के हाथ लगी मात्र छिटपुट कामयाबी। जबकि इसमें टीमों के खिलाड़ियों और विभिन्न चयनसमितियों को दी जाने वाली धनराशि शामिल नहीं है। इस भारी भरकम खर्च और सपोर्टिंग स्टाफ के चयन के तौर तरीकों पर अब यूपीसीए के भीतर से ही आवाजें उठने लगी हैं। पिछले दिनों यूपीसीए की अपेक्स कमेटी की मीटिंग में संघ उपाध्यक्ष राकेश मिश्रा ने जब कुछ सवाल उठाए तो वहां सन्नाटा छा गया।

टीमों के लिए जम्बो सपोर्टिंग स्टाफ और उन पर हो रहे करोड़ों के खर्च के बाद भी अपेक्षित परिणाम न मिलने पर उपाध्यक्ष का ज़मीर जब जागा तो इस अंधेरगर्दी पर उनका तीखा रिएक्शन आया। उन्होंने मीटिंग में पूछ लिया कि यहां यह कैसी मनमानी चल रही है? सपोर्टिंग स्टाफ की नियुक्त करने की प्रक्रिया क्या है? कौन करता है नियुक्ति? नियुक्ति का पैमाना क्या है? क्या सपोर्टिंग स्टाफ के विभिन्न पदों के लिए विज्ञापन दिया गया था? किसको कितना भुगतान करना है यह कौन तय करता है?

ये सवाल बेहद साधारण से थे लेकिन इनका जवाब किसी के पास नहीं था, जबकि इस मीटिंग में अध्यक्ष निधिपत सिंहानिया और सचिव प्रेम मनोहर गुप्ता भी मौजूद थे। बाद में अध्यक्ष ने कहा कि आप संघ के उपाध्यक्ष हैं, आप ही बैठकर इस मसले को देखिए और ठीक कीजिए। जेके घराने के इस हल्के से दखल ने यह इशारा दिया कि देर से ही सही लेकिन यूपी क्रिकेट में अहम योगदान करने वाला सिंहानिया घराना अब आंखें मूंदे नहीं बैठा रहेगा। यह भी संभव है कि ये सवाल एक पूर्वनियोजित योजना का हिस्सा रहे हों और दूसरी लॉबी ने पानी सिर के ऊपर से बहने पर उपाध्यक्ष के माध्यम से उठवाए हों।

दरअसल यूपीसीए की एक पावरफुल लॉबी बिना सीनियर्स को विश्वास में लिए ही सब कुछ तय कर लेती है। अपुष्ट सूत्रों के अनुसार इस लॉबी पर बीसीसीआई में यूपीसीए के प्रतिनिधि राजीव शुक्ला का हाथ होने की वजह से कोई चू तक नहीं कर पाता। हालांकि इस दावे की स्पोर्ट्स लीक पुष्टि नहीं करती है। यूपीसीए की इस लॉबी की मनमानी का आलम यह है कि अधिकांश मेम्बर्स को भनक तक नहीं लगती कि क्या फैसले लिए जा रहे हैं। यही वजह है कि हाल ही में हुए स्पीड हंट कार्यक्रम की जानकारी भी सभी मेम्बर्स और यूपीसीए के सभी पदाधिकारियों को नहीं थी।

स्पीड हंट कार्यक्रम की जानकारी न मिलने पर भी उपाध्यक्ष ने हैरानी जताते हुए पूछा कि इस बारे में सभी मेम्बर्स को क्यों नहीं बताया गया। इस पर यूपीसीए के एक स्टाफ ने कहा कि सोशल मीडिया में इस कार्यक्रम के बारे में डाल दिया गया था। इस पर उपाध्यक्ष ने कहा कि इन्फॉर्म करने का यह क्या तरीका हुआ? इसकी जानकारी तो सभी को व्यक्तिगत तौर पर भी भेजी जानी चाहिए थी। हमारी वर्किंग में पारदर्शिता क्यों नहीं है?

बता दें कि यूपीसीए में सपोर्टिंग स्टाफ के रूप में अपनों और अपनों के अपनों को नियुक्ति दिए जाने पर संघ के भीतर लगातार आक्रोश पनप रहा है। यही वजह रही कि जनता की कमाई को अपनों के ऊपर मनमनाने ढंग से उड़ाने का उपाध्यक्ष को संज्ञान लेना पड़ा। अपेक्स कमेटी के एक मेम्बर ने कहा कि हम खुश हैं कि कम से कम किसी पदाधिकारी ने तो इस बारे में बोलने का साहस दिखाया।

वहीं जब यूपीसीए उपाध्यक्ष राकेश मिश्रा से इस बारे में बात की गई तो उन्होंने कोई भी कमेंट करने से इनकार करते हुए कहा कि यह हमारा अंदरूनी मामला है और हम इसे सुलझा लेंगे। याद दिला दें कि राकेश मिश्रा वही हैं जिन्हें अपने पुत्र का यूपी टीम से इसलिए नाम वापस लेना पड़ा था, क्योंकि उन पर हितों के टकराव (का्फ्लिलक्ट ऑफ इंट्रेस्ट) का मामला बताकर संघ के कुछ लोगों ने नेपथ्य से इसको खूब वायरल करवाया था।

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