उत्तराखंड क्रिकेट में एजीएम प्रतिनिधित्व पर घमासान, महिम वर्मा की पात्रता पर सवाल

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साभार : गूगल

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड की आगामी वार्षिक आम बैठक से पहले उत्तराखंड क्रिकेट का एक मामला कई असहज सवाल खड़े कर रहा है। सवाल यह नहीं है कि एजीएम में उत्तराखंड का प्रतिनिधि कौन होगा।

असली सवाल यह है कि जब क्रिकेट एसोसिएशन ऑफ उत्तराखंड (CAU) के पूर्व सचिव महिम वर्मा इस समय संघ के किसी पद पर नहीं हैं, तो फिर उन्हें बीसीसीआई की एजीएम में राज्य संघ का प्रतिनिधि बनाए जाने का आधार क्या है?

यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि बीसीसीआई खुद अपने संवैधानिक नियमों और प्रशासनिक पात्रताओं को लेकर बेहद सख्त रुख अपनाता रहा है। कई राज्य संघों के प्रतिनिधित्व और उनकी बैठकों में भागीदारी को लेकर नियमों की कसौटी पर फैसले किए जाते हैं। ऐसे में उत्तराखंड के मामले में भी वही कसौटी लागू होनी चाहिए।

मामला केवल एक प्रतिनिधि के चयन तक सीमित नहीं है। इसके पीछे उत्तराखंड क्रिकेट में पिछले कुछ वर्षों से चले आ रहे सत्ता-संतुलन और पारिवारिक प्रभाव का सवाल भी जुड़ा हुआ है।

महिम वर्मा CAU के पूर्व सचिव हैं। मौजूदा समय में वह संघ के किसी पद पर नहीं हैं। दूसरी ओर उनकी पत्नी किरण रौतेला वर्मा CAU की सचिव हैं और संघ के प्रशासनिक ढांचे में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं।

यहीं से पहला और सबसे सीधा सवाल उठता है—जब संघ का मौजूदा सचिव मौजूद है, तो बीसीसीआई की एजीएम में उत्तराखंड का प्रतिनिधित्व उनके पति महिम वर्मा क्यों कर रहे हैं?

अगर किसी कारण से सचिव एजीएम में प्रतिनिधित्व नहीं कर सकती थीं, तो क्या CAU के किसी अन्य मौजूदा पदाधिकारी को यह जिम्मेदारी नहीं दी जा सकती थी?

किसी पूर्व पदाधिकारी को, जो वर्तमान में संघ की कार्यकारिणी में किसी पद पर नहीं है, राज्य संघ का प्रतिनिधि बनाए जाने के पीछे आखिर कौन-सा प्रशासनिक तर्क है? यही वह सवाल है जिसका स्पष्ट जवाब CAU और बीसीसीआई, दोनों को देना चाहिए।

क्योंकि प्रतिनिधित्व महज एक औपचारिकता नहीं होता। बीसीसीआई की एजीएम में राज्य संघ की ओर से जाने वाला व्यक्ति संघ की आधिकारिक आवाज माना जाता है। इसलिए उसकी पात्रता और नियुक्ति की प्रक्रिया भी उतनी ही पारदर्शी होनी चाहिए।

महिम वर्मा के मामले में दूसरा और अधिक गंभीर प्रश्न कूलिंग-ऑफ से जुड़ा है। लोढ़ा सुधारों के बाद क्रिकेट प्रशासन में लगातार यह जोर दिया गया कि कोई व्यक्ति लंबे समय तक लगातार पद पर बने रहकर संघ की पूरी व्यवस्था पर स्थायी नियंत्रण न बना ले। इसी सोच के तहत कार्यकाल और कूलिंग-ऑफ जैसे प्रावधान महत्वपूर्ण बने।

ऐसे में यदि महिम वर्मा फिलहाल कूलिंग-ऑफ अवधि में हैं, तो यह जानना जरूरी है कि किस प्रावधान के तहत उन्हें बीसीसीआई की एजीएम में CAU का प्रतिनिधि बनाया गया है?

यहां सवाल उनकी व्यक्तिगत योग्यता पर फैसला सुनाने का नहीं, बल्कि नियमों की स्पष्ट व्याख्या का है। यदि संविधान में ऐसी स्थिति के लिए कोई प्रावधान मौजूद है, तो उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए। और यदि ऐसा कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं है, तो फिर प्रतिनिधित्व की वैधता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

तीसरा सवाल हितों के टकराव का है। एक तरफ CAU के प्रशासन में महिम वर्मा की पत्नी सचिव के पद पर हैं और दूसरी तरफ बीसीसीआई की एजीएम में प्रतिनिधि के तौर पर महिम वर्मा का नाम सामने आ रहा है।

कानूनी रूप से यह स्थिति अपने आप में किसी उल्लंघन का अंतिम प्रमाण नहीं है। लेकिन क्रिकेट प्रशासन में पारदर्शिता केवल नियमों का पालन करने से नहीं, बल्कि हितों के टकराव की संभावनाओं से बचने से भी जुड़ी है।

अगर राज्य संघ के मौजूदा प्रशासन और बीसीसीआई में उसके प्रतिनिधित्व के बीच एक ही परिवार के दो सदस्यों की भूमिका बनती है, तो स्वाभाविक तौर पर सवाल उठेंगे। खासकर तब, जब प्रतिनिधि स्वयं संघ के मौजूदा पदाधिकारी नहीं हैं।

यही वजह है कि CAU को यह स्पष्ट करना चाहिए कि महिम वर्मा के नाम का चयन किस प्रक्रिया से हुआ और क्या इस संबंध में संघ की आम सभा या सक्षम निकाय ने कोई औपचारिक निर्णय लिया था?

फैसला किसने लिया? इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू शायद यही है। क्या महिम वर्मा को एजीएम प्रतिनिधि बनाने का निर्णय CAU की निर्धारित संवैधानिक प्रक्रिया के तहत लिया गया? क्या इसके लिए कोई प्रस्ताव पारित हुआ?क्या संघ के सभी संबंधित पदाधिकारियों को इस निर्णय की जानकारी थी?

और सबसे महत्वपूर्ण—क्या बीसीसीआई ने प्रतिनिधि की पात्रता और CAU की ओर से उनके नामांकन की प्रक्रिया की स्वतंत्र रूप से जांच की है?

इन सवालों के जवाब सामने आने चाहिए। क्योंकि अगर प्रक्रिया पूरी तरह नियमों के मुताबिक हुई है तो विवाद खत्म करने का सबसे आसान रास्ता यही है कि पूरी प्रक्रिया को सार्वजनिक कर दिया जाए।

महिम वर्मा का नाम उत्तराखंड क्रिकेट में पहले भी विवादों से जुड़ता रहा है। उनके खिलाफ आर्थिक अनियमितताओं, चयन प्रक्रिया में कथित हस्तक्षेप, खिलाड़ियों या सदस्यों को कथित धमकी तथा अन्य मामलों से जुड़े आरोपों और कानूनी कार्रवाइयों का उल्लेख अलग-अलग सार्वजनिक रिपोर्टों, FIR और न्यायिक कार्यवाहियों के संदर्भ में सामने आता रहा है।

हालांकि इन आरोपों को किसी व्यक्ति के खिलाफ अंतिम निष्कर्ष के रूप में पेश करना उचित नहीं होगा। किसी भी आपराधिक आरोप की अंतिम स्थिति अदालत के निर्णय से ही तय होती है। इसलिए इन मामलों में आधिकारिक रिकॉर्ड और न्यायिक स्थिति को देखना जरूरी है।

लेकिन प्रशासनिक दृष्टि से इन विवादों का महत्व इसलिए है क्योंकि बीसीसीआई स्वयं क्रिकेट प्रशासन में पारदर्शिता, जवाबदेही और स्वच्छ प्रशासन की बात करता रहा है। ऐसे में जिस व्यक्ति की भूमिका को लेकर सार्वजनिक रूप से सवाल उठते रहे हों, उसे किसी राज्य संघ का प्रतिनिधि बनाते समय प्रक्रिया और पात्रता को लेकर अतिरिक्त स्पष्टता अपेक्षित होती है।

यहीं से सवाल बीसीसीआई के रवैये पर पहुंचता है। यदि नियमों और प्रशासनिक अनियमितताओं के आधार पर कुछ राज्य संघों के प्रतिनिधित्व पर रोक लगाई जा सकती है, तो उत्तराखंड के मामले में भी वही मानक क्यों नहीं अपनाया जाना चाहिए?

बीसीसीआई को यह स्पष्ट करना चाहिए कि CAU के प्रतिनिधि के रूप में महिम वर्मा की पात्रता किस आधार पर स्वीकार की गई है। क्या उनके मौजूदा पद की अनुपस्थिति, कूलिंग-ऑफ की स्थिति और प्रतिनिधि चयन की प्रक्रिया की जांच की गई है? अगर सभी नियमों का पालन हुआ है, तो बीसीसीआई के पास इसे स्पष्ट करने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए।

लेकिन यदि एक तरफ कुछ संघों पर नियमों की सख्ती दिखाई जाती है और दूसरी तरफ समान प्रकृति के सवालों वाले मामले में आंखें मूंद ली जाती हैं, तो फिर बीसीसीआई के ‘एक समान नियम, एक समान मापदंड’ वाले दावे पर सवाल उठना तय है।

इस पूरे विवाद को केवल महिम वर्मा बनाम उनके विरोधियों के रूप में देखना इस मामले को छोटा कर देगा। असल मुद्दा यह है कि क्रिकेट संघ किसी व्यक्ति या परिवार की निजी राजनीतिक-सामाजिक व्यवस्था नहीं, बल्कि खिलाड़ियों और खेल के हितों के लिए बनी संस्थाएं हैं।

किसी व्यक्ति का पूर्व पदाधिकारी होना उसे हमेशा के लिए अयोग्य नहीं बनाता और किसी पदाधिकारी की पत्नी या पति होना भी अपने आप में नियमों का उल्लंघन नहीं है। लेकिन जब एक पूर्व पदाधिकारी, वर्तमान पदाधिकारी के पारिवारिक संबंध में होते हुए, फिर उसी संघ की ओर से राष्ट्रीय बोर्ड की सर्वोच्च बैठक में प्रतिनिधित्व करने लगे, तो प्रक्रिया पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

इसलिए अब गेंद CAU और बीसीसीआई के पाले में है। महिम वर्मा को एजीएम में भेजने का संवैधानिक आधार क्या है? उनकी पात्रता की जांच किस स्तर पर हुई? कूलिंग-ऑफ की स्थिति में उन्हें प्रतिनिधित्व का अधिकार किस प्रावधान से मिला? और CAU ने अपने किसी मौजूदा पदाधिकारी के बजाय उन्हें ही प्रतिनिधि क्यों चुना? इन चार सवालों के साफ और सार्वजनिक जवाब मिल जाएं तो शायद पूरा विवाद खत्म हो जाए।

लेकिन अगर जवाब नहीं आते, तो फिर यह सवाल और बड़ा होगा कि भारतीय क्रिकेट प्रशासन में नियम वास्तव में सबके लिए समान हैं या कुछ लोगों के लिए नियमों की व्याख्या अलग तरीके से की जाती है।

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