– ..तो यूपीसीए उपाध्यक्ष को छोड़ क्यों दिया, कर देते बर्खास्त
बेबाक/संजीव मिश्र
यह खबर खास नहीं लेकिन यूपी क्रिकेट में करप्शन का लेवल जरूर बताती है। दीपावली दूर है लेकिन संघ में पटाखों के धमाके अभी से गूंज रहे हैं। क्रिकेट संघ के कुबेर का हिसाब रखने वाले एक हज़रत इन दिनों वसूली में लगे हैं। वेंडरों के पेमेंट के चेक पर चिड़िया बैठाने से पहले उनसे नजराना मांग रहे हैं। अभी हाल ही की बात है खुद को चाचा का उत्तराधिकारी बताने वाले भतीजे ने एक वेंडर के चेक पर यह शर्त पूरी होने तक साइन करने से इंकार कर दिया कि दीवाली आ रही है पहले मेरे घर पर शिवा काशी के पटाखे पहुंचाओ तभी साइन करूंगा। वेंडर ने मार्केट में जब अपना दुखड़ा रोया तो बात फैल गई। यह तो वह मामला है जो संज्ञान में आ गया, संघ को करीब से जानने वाले तो बताते हैं कि यहां हर चेक पर भेंट चढ़ाने का दस्तूर सा बन गया है। हालांकि स्पोर्ट्स लीक इस चर्चा की पुष्टि नहीं कर रही।
कथित रूप से यह साहब बिना मेहनत के कुर्सी पा जाने के बाद चाचा की हनक के गुरूर में खलीफा गिरी भी करते हैं और बाकी सब इन्हें झेलते हैं। सूत्रों की मानें तो अक्सर दफ्तर में अपने छंटे हुए “शरीफ” दोस्तों को साथ लाकर रौब ग़ालिब करते हैं। किसी समारोह में जब सुरा चढ़ जाए तब तो इनका कहना ही क्या। लोग कहते भी हैं कि कहां शालीन चाचा और कहां उनका भतीजा! यह सब भी चर्चा के आधार पर ही है, स्पोर्ट्स लीक इसकी पुष्टि नहीं कर रही।
चलिए मुद्दा बदलते हैं। एजीएम के दो दिन बाद विभिन्न अखबारों में प्रकाशित हंगामे की खबर एक सी भाषा में आई तो चौंकना लाजिमी था। यह इत्तेफाक तो बिल्कुल नहीं था, इसलिए हास्यास्पद लगा। जैसे खबरनबीसों को एक साथ ब्रीफ कर लिखवाया गया हो। इसके पीछे तर्क भी है। 30 सितंबर को एजीएम के बाद लंच साढ़े तीन बजे तक चला। उसके बाद भी रिपोर्ट लिखने के लिए 7 घंटे का समय था। खबर लिखी भी गई लेकिन उस दिन डिटेल में नहीं थी। फिर एक दिन बाद अचानक पूरी खबर आई जिसे पढ़कर लगा कि संघ शायद अब बताना चाहता है कि जो उपाध्यक्ष जो गाते फिर रहे हैं कि मैंने ऐसा कर दिया, वैसा कर दिया, अब उनका मुंह बंद करवा दिया जाए। रणनीति बनी और फिर दो दिन बाद इस संक्षिप्त महाभारत के ‘संजय’ से एजीएम का आंखों देखा हाल सुनवा दिया गया। एजीएम में कोई रिपोर्टर तो जा नहीं सकता था, इसलिए जैसा बताया गया वैसा ही लिख दिया गया।
हालांकि इस खबर की कोई जरूरत नहीं थी, क्योंकि यह एकतरफा थी। एक अखबार ने जरूर अपने विवेक से खबर लिखी और दोनों पक्षों का बयान भी लिया। अखबारों को वह भी लिखवाया गया, जिसकी कोई संभावना तो नहीं थी, बस एजीएम से पूर्व पटकथा लिखी गई थी। मान भी लें कि उपाध्यक्ष को बर्खास्त करने का मन बना लिया गया था तो फिर छोड़ क्यों दिया गया?
दरअसल बीसीसीआई उपाध्यक्ष के काम करने का यह स्टाइल है ही नहीं है, क्योंकि वे किसी को हटाते ही नहीं हैं। वह अपना शिकार हौले-हौले करते हैं। आगरा इसका उदाहरण है। सूत्रों की मानें तो बर्खास्तगी की धमकी का तो एजीएम में एक नाटक किया गया था। सबकी भूमिकाएं एक दिन पहले और एजीएम वाले दिन सुबह ही समझा दी गई थीं। एजीएम में कब एक्शन होना था और राजीव शुक्ला को कब कट कहना है यह भी पहले से तय था। चेतावनी के साथ एक डर दिखाना था सो दिखा दिया गया और हो गई पटकथा पूरी।
यूपीसीए उपाध्यक्ष राकेश मिश्रा का स्टैंड भी किसी सीनियर के अनुभव वाला नहीं था। हालांकि उन्होंने सवाल तो सही उठाए थे लेकिन समय और स्थान का चयन उचित नहीं था। आप सिस्टम का हिस्सा हैं तो यह भी पता होना चाहिए कि कोई बड़ी गड़बड़ी कैसे सुधारी जाती है। प्रेसिडेंट, सेक्रेटरी या राजीव शुक्ला से मिलकर अपनी बात रखनी चाहिए था। राजीव शुक्ला से आपकी बात हो भी चुकी थी, जब कोई नतीजा नहीं निकला तो एजीएम में मुखर होने से भी कुछ नहीं मिलने वाला था, क्योंकि यदि बदलाव हो सकता था तो वह एजीएम से पहले ही हो सकता था। एजीएम में तो बस फैसलों की घोषणा की जाती है। एजीएम में विरोध ने आपको बागी ठहरा दिया।
सिस्टम से बाहर होकर आप कुछ नहीं कर सकते। राजीव शुक्ला की मूक चेतावनी के बाद इस बार तो कुर्सी बच गई लेकिन राकेश मिश्रा के लिए आगे का सफर मुश्किलों भरा हो सकता है। जहां तक सपोर्ट स्टाफ के चुनाव की बात है तो यूपीसीए के ज्यादातर पदाधिकारियों को पता है कि क्या गलत और क्या सही है। समय और स्थान की बात छोड़ दें तो यूपीसीए उपाध्यक्ष का विरोध और सुझाव गलत नहीं थे। यूपीसीए ने संविधान बदला तो वो यूपीसीए ऑफीसियल्स और बीसीसीआई को भी पता होना चाहिए था। लेकिन बीसीसीआई की साइट में यूपीसीए का वही संविधान दिखा रहा है जिसका राकेश मिश्रा ने जिक्र किया था। सत्य अकेला चलता है इसलिए जो हो रहा है, समझा जा सकता है। लेकिन उपाध्यक्ष को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि साहस और दुस्साहस में सिर्फ डेढ़ अक्क्षर का ही फर्क होता है।
उन्होंने युवा संयुक्त सचिव के लिए जो कहा, उसकी जरूरत नहीं थी। कब, कहां और क्या बोलना है यह भी आपको पता होना चाहिए। कुछ सवाल तो यूपीसीए में सबके दिलों में हैं, मसलन हर बार क्यों कुछ खास चेहरों पर ही कृपा बरसती है? क्रिकेट एडवाइजरी कमेटी में जो लोग हैं क्या सपोर्ट स्टाफ का चयन उन्हीं ने किया था या वे हाई टी के साथ मीटिंग की औपचारिकता पूरी कर सिर्फ सूची पर चिड़िया बैठाने गए थे? यह तो वही हुआ कि एडवाइजरी कमेटी कॉफी में पड़ीं चींटीयों को भी आंख बंद कर पी गईं। दाल में नमक खाने की बात तो समझ में आती है लेकिन यदि ज्यादा नमक वाली दाल खाएंगे तो आवाज भी उठेगी।
हालांकि सब कुछ खराब ही नहीं हो रहा है। यूपी क्रिकेट में जो साकारात्मक बदलाव दिख रहे हैं उसे नकारा नहीं जा सकता। एजीएम की शुरुआत में यूपीसीए ने क्रिकेट के डेवलपमेंट, शानदार इन्फ्रा स्ट्रक्चर और यूपी क्रिकेटरों के अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर चमकने की जो उपलब्धियां दिखाई गईं थीं, उन पर कोई सवाल नहीं उठाया जा सकता। कभी बीसीसीआई उपाध्यक्ष के प्रयासों से तो कभी रोटेशन के तहत, यूपीसीए को नियमित मैच मिलने को भी बड़ी उपलब्धि मान लेते हैं। लेकिन 21 सालों से रणजी ट्रॉफी न जीत पाना, टूर्नामेंट में खिलाड़ियों की फौज ले जाना और अक्सर टीम, सपोर्ट स्टाफ की चयन प्रक्रिया फेयर न होने के आरोप लगना यूपी क्रिकेट का एक काला सच भी है। आप बड़े जहाज में लगातार डेंट बर्दाश्त करते रहते हैं तो एक दिन वो डूब ही जाता है। यूपी क्रिकेट फेयर सेलेक्शन न होने से अपना रुतबा खो चुका है। 24 करोड़ की आबादी वाला जो राज्य 21 साल से रणजी ट्रॉफी न जीत पा रहा हो तो सोचना तो पड़ेगा ही कि आखिर कहां गड़बड़ी है।










