यूपीसीए का खेल : मालिश वाले भी खूब लगा रहे तेल, एक सीजन में दी 42 लाख की मसाज!

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लखनऊ। संजीव मिश्र

 

इस देश में आजकल नामचीन कॉलेजों से एमबीए करके निकले छात्रों को 10 लाख का पैकेज लेने से पहले कड़ा संघर्ष करना पड़ता है लेकिन यूपी क्रिकेट में ऐसा नहीं है। यदि आप अच्छी मालिश कर लेते हैं तो एमबीए के पास आउट छात्रों को मिलने वाले पैकेज जितना या उससे भी बड़ा कान्ट्रैक्ट हासिल कर सकते हैं, क्योंकि खेलों में अब क्वालिफाइड मैसोर (मालिश करने वाले) के लिए काफी स्कोप है और उनको भी 10-12 लाख का कन्ट्रैक्ट मिल रहा है। कॉरपोरेट कंपनियों में 12-12 घंटे की रगड़ाई भी नहीं और सीजन खत्म होने पर 3-4 महीने की घर बैठे कमाई भी।

अब सीधे मुद्दे पर आते हैं। यूपीसीए ने 2025-26 के सीजन में विभिन्न मेन्स टीमों की मालिश में 42 लाख रुपए खर्च कर डाले। इसमें तेल मालिश वालों को 2 लाख से 12 लाख तक का पैकेज दिया गया। मैसोर की नियुक्ति टीमों की जरूरत है, इसमें कुछ गलत भी नहीं है लेकिन इनके साथ अलग-अलग धनराशि पर करार शक पैदा करता है। मसलन किसी को सिर्फ 2 लाख या 6 लाख और किसी को 12 लाख का भुगतान किया गया। हालांकि 5 मैसोर पर इतनी बड़ी धनराशि खर्च करने की कोई तुक भी नजर नहीं आती। खास कर तब जब टीमों के साथ फीजियोथेरेपिस्ट भी मौजूद हों। 5 मैसोर पर 42 लाख रुपए की तो यह सिर्फ अनुबंध राशि है, इन पर हुए थ्री, फोर या फाइव स्टार होटलों के खर्चे अलग से हैं।

टीम और अन्य ऑफीसियल्स की तरह ही घर से किसी टूर्नामेंट के लिए निकलते ही मैसोर भी यूपीसीए के मेहमान बन जाते हैं और इनका मीटर चालू हो जाता है। लोकल ट्रैवलिंग के अलावा मैच वैन्यू सिटी तक आने जाने का एयर फेयर, थ्री से फाइव स्टार होटल (जिसमें भी यूपी टीम रुकती है) में स्टे, प्रतिदिन का डीए, पूरे सीजन के लिए 10 से ज्यादा लोअर टी शर्ट, बैग, कैप आदि को जोड़ लें तो एक मैसोर पर भारी खर्च आता है। इसके अलावा इनको दैनिक भत्ते के रूप में बोर्ड ट्रॉफी मुकाबले के दौरान 1200 रुपए और लोकल कैम्प या हाई परफॉर्मेंस कैम्प के दौरान प्रतिदिन 1000 रुपए का भुगतान होता है। यदि एक टीम 5 मैच अलग-अलग शहरों या राज्यों में खेलती है तो स्वाभाविक है कि ये मैसोर भी साथ ही जाते हैं। अब हिसाब लगाइए कि एक मालिश वाले पर कितना भारी खर्च आ रहा है और जनता के टैक्स की कमाई को किस तरह उड़ाया जा रहा है।

बीते सीजन सीनियर मेन्स टीमों के लिए दो मालिश करने वाले विशाल ठाकुर और बादल दीक्षित रखे गए थे। इनमें विशाल को 10 लाख और बादल को 6 लाख का भुगतान किया गया। अंडर 19 के मैसोर रविकांत और अंडर-23 के प्रदीप कुमार को 12-12 लाख दिए गए, जबकि अंडर-16 के लिए अमरीश कुमार को सिर्फ 2 लाख ही मिले। आखिर यह असमानता क्यों? कौन तय करता है कि किसको कितना पैसा मिलेगा। यह सवाल अपेक्स कमेटी की बैठक में उठ चुका है।

इस बारे में यूपीसीए के एक पदाधिकारी ने नाम न खोलने की शर्त पर बताया कि यह सारा पैसा इनके अकाउंट में ट्रांसफर तो होता है लेकिन बाद में उसमें से बड़ा कट उस व्यक्ति की जेब में चला जाता है, जो इनकी नियुक्ति करवाता है। ऐसा सिर्फ मैसोर के साथ ही नहीं बल्कि लगभग हर सपोर्टिंग स्टाफ के कान्ट्रैक्ट अमाउंट से होता है। यानि जितना पैसा ऑन द रिकॉर्ड दिखाया जाता है, उतना पेमेंट इन्हें मिलता नहीं है। मैसोर और फीजियो ऑफ सीजन में यूपीसीए के मास्टर माइंड के घर पर ड्यूटी देते हैं। हालांकि इस पदाधिकारी के इन आरोपों की स्पोर्ट्स लीक पुष्टि नहीं कर रही पर ये आरोप जांच का विषय जरूर हो सकते हैं।

यूपीसीए को चलाने वाले मास्टर माइंड को तो ‘चांद और ….’ का फर्क भी समझ में नहीं आता। तभी तो 15 प्रथम श्रेणी और 19 लिस्ट ए मैच खेलने वाले अरविन्द कपूर 21 लाख के पैकेज के साथ रणजी ट्रॉफी के हेड कोच बनाए जाते हैं, जबकि दो वन डे इंटरनेशनल, 117 प्रथम श्रेणी और 82 लिस्ट ए मैच खेलने वाले ज्ञानेन्द्र पांडे को भी इतनी ही कान्ट्रैक्ट राशि के साथ अंडर-23 का कोच बनाया जाता है।

 

 

 

 

 

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